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Male Sex Problem

अधिकांश पुरुषों के इरेक्ट या टाइट लिंग पर एक या एक से ज़्यादा नीली नसें दिखाई देती हे।
लोगों को गुमराह करने वाले वैद्य या हकीम इसी को बीमारी बना के अपना उल्लू सीधा करते हे। उनके अनुसार ये सेक्स की कमज़ोरी की निशानी है और हस्तमैथुन की अधिकता इसका कारण है। मुझे कोई हैरानी नहीं होती जब मेरे पास आने वाले अधिकतर मरीज़ इसी ग़लत फ़हमी से ग्रसित होते हे ।

असलियत क्या है?
शरीर में दो प्रकार की रक्त वाहिकाएँ होती है-
ऑक्सिजन युक्त ताज़ा ख़ून ले जाने वाली आर्टरी और ऑक्सिजन रहित ख़ून को वापिस हृदय की और ले जाने वाली वेंज़ ।
पहले वाली आर्टरी शरीर में त्वचा से गहरे में होती हे और नज़र नहीं आती परंतु veins सतह और गहराई दोनो जगह होती हे। जैसे हाथ के पीछे आप को सतही वेंज़ दिखती हे जिनमे आवश्यकता अनुसार आप को इंजेक्शन लगाया जा सकता हे। इसी प्रकार लिंग पर दिखने वाली ये भी सतही veins हे जो बिलकुल सामान्य बात हे, कोई बीमारी का लक्षण नहीं है।

दुनिया भरके वयस्क पुरूषों में यह समस्या पायी ज़ाती हे । लगभग २१% से ज़्यादा पुरुषों की यह सबसे गंभीर सेक्स समस्या हे। यदि योनि प्रवेश से १ मिनट के भीतर पुरुष संखिलत हो जाए तथा इस कारण आपस में तनाव होने लगे तो इसे शीघ्र पतन कहा जाएगा । इसके कारण विवाहित जीवन में तनाव , निराशा, तनाव या तलाक़ की नोबत आ सकती हे । बहुत बार इसी कारण विवाह उपरांत शारीरिक सम्बंध नहीं बन पाते ।
यदि आप को लगता हे कि कोई सेक्स समस्या हे तो अभी तुरंत डॉक्टर से मिलने का अपॉंट्मेंट ले सकते हे।

ये समस्या दो प्रकार की होती हे –  Life Long यानि सेक्स जीवन आरम्भ करने से लेकर अथवा Aquired यानि कुछ समय ठीक रहने के बाद से लेकर । कुछ मामलों में समस्या केवल एक पार्ट्नर ( वेवाहिक साथी अथवा कोई अन्य ) के साथ होती हे जिसे situational कहते हे अन्यथा यह सभी परिस्थितियों में जिसे global कहा जाता हे ।

इसके अनेक कारण हो सकते हे –
1. लिंग का अति संवेदनशील होना जिस से कम उत्तेजना से ही discharge हो जाता हे । यदि किसी कारण तनाव की स्थिति हो जाए तो ये समस्या विकराल रूप धारण कर लेती हे।
2. लिंग में उत्तेजना की कमी
3. मानसिक परेशानी , अवसाद , ज़्यादा चिंता अथवा पार्ट्नर को संतुष्ट न कर पाने का डर
4. पार्ट्नर् से सम्बन्धों में तनाव. उपयुक्त एकान्त का अभाव
5. सेक्स हॉर्मोन की कमी
6. नर्वस सिस्टम में डोपमीन की कमी
7. प्रास्टेट ग्रंथि की सूजन

उपचार-
1. काउन्सलिंग तथा exercise – किगेल exercise, प्राणायाम तथा नियमित व्यायाम ज़रूरी हे । जीवन साथी से तनाव की स्थिति में पहले इसी से निपटना चाहिए । इस उपचार को ऑनलाइन भी लिया जा सकता हे ।
2. दवा आवश्यक होती हे। कई दवाइयाँ असरदायक होती हे। हमें सभी मामलों में सफलता मिली हे क्योंकि हम कॉम्प्रेहेन्सिव उपचार करते हे।
3. सर्जरी- लाइफ़ लोंग मामलों में frenuloplasty के अलावा कई प्रसीजर फ़ायदेमंद होते हे ।
इसके लिए 4-6 महीने उपचार की आवश्यकता हो सकती हे। कई मामलों में कम समय दवा से भी काम चल जाता हे।

यदि सम्भोग के समय पुरुष के लिंग में वांछित टायट्नेस या सख़्ती न होने से अपेक्षित सेक्स न हो पाए जिससे एक या दोनो पार्ट्नर्ज़ को परेशानी हो या संबंधो में तनाव हो तो इस को नपुंसकता की स्थिति कहा जाता हे।
यदि कभी कभार ही ऐसी स्थिति हो तो इसका अर्थ ये नहीं कि पुरुष को नपुंसकता की समस्या हे।
आप को केवल इतनी कठोरता ही चाहिए जिस से सेक्स के लिए सुगमता से योनि में प्रवेश हो सके। सेक्स के दौरान कठोरता में थोड़ी कमी होना सामान्य बात हे परंतु यदि आप सेक्स प्रक्रिया को सुगमता से पूर्ण कर लेते हे तो चिंता कि कोई बात नहीं हे।

लिंग में सामान्य तौर पर कठोरता कैसे आती हे-
जब आप सेक्स के लिए सामान्य कामक्रीड़ा आरम्भ करते हे तो वांछित संदेश दिमाग़ की नाड़ियों से आपके लिंग में पहुँचता हे। इस से नाइट्रिक आक्सायड गैस बनती हे जिस से लिंग में रक्त संचार सामान्य से दस गुना तक बढ़ जाता हे। परिणाम स्वरूप लिंग का आकार बढ़ जाता हे। जब रक्त संचार व्यवस्था में ऐसा हो जाए कि रक्त लिंग में रहे पर वापिस शरीर में न जा सके तो अधिकतम कठोरता आ जाती हे। सेक्स क्रिया पूरी होने पर रक्त संचार वापिस शुरू हो जाता हे और धीरे धीरे सारा अतिरिक्त रक्त शरीर में वापिस चला जाता हे।

ये समस्या कितने लोगों को होती हे-
हमारे देश में इस बारे में कोई विश्वसनीय आँकड़े नहीं हे परंतु अनुमान के अनुसार चालीस वर्ष तक के 40-50% लोगों में और सत्तर वर्ष की आयु तक के पुरुषों में से 70-80% को इस समस्या का सामना करना पड़ता हे।

मुख्य कारण-
– मनोवेज्ञानिक कारण जिनसे दिमाग़ में आवश्यक सेक्स संदेश ही पैदा नहीं होते जैसे डिप्रेशन, ऐंज़ाइयटी , चिंता , आत्मविश्वास की कमी या कोई डर।
– रक्त संचार की कमी जैसे रक्त की नाड़ियों का सिकुड़ जाना तो आवश्यक रक्त की मात्रा ही सेक्स के समय लिंग में नहीं जा पाती । ऐसे में लिंग में कठोरता आयेगी ही नहीं
– उच्च रक्त चाप , मधुमेह और अनेक ऐसी सामान्य समझी जाने वाली बीमारियाँ
– अनेक दवाओं के साइड इफ़ेक्ट
– टेस्टास्टरोन हॉर्मोन की कमी
– तम्बाकू , शराब या कोई अन्य नशा
– मोटापा

डॉक्टर सेकब सम्पर्क करना चाहिए-
यदि आप लगातार तीन से चार सप्ताह तक कोशिश करने पर भी सेक्स न कर पाए तो तुरंत सेक्सोलोजिसट से मिलो ।

कैसे इस के कारण का पता लगाया जा सकता हे-
1. पूरी हिस्ट्री से मनोवेज्ञानिक कारण
2. रक्त जाँच से हॉर्मोन , शुगर और अन्य बीमारियाँ पता लग जाती हे ।
3. डाप्लर जाँच या अल्ट्रसाउंड से रक्त संचार का पता लगता हे।
4. नाड़ियों की जाँच से नर्व्ज़ की बीमारी का पता लग जाता हे।
5. एन॰पी॰टी॰- इस से ये पता लग जाएगा कि नपुसकता मनोविज्ञानी हे या शारीरिक कारण से

उपचार-
इस समस्या का उपचार सम्भव हे इसलिए यदि आप अपने जीवन में नपुंसकता का शिकार हे तो घबराये नहीं। इस को ठीक करने के कई तरीक़े हो सकते हे-
1. खाने की दवाई- कई तरह की दवा उपलब्ध हे जैसे सिल्डेनफ़िल, तदलफ़िल, उदेनफ़िल, वेरदेनफ़िल, अवनफ़िल जैसे आठ तरह के मालक्यूल उपलब्ध हे । भारत में पहले तीन ही मिलते हे। इन्हें सेक्स से एक घंटे पहले ख़ाली पेट लेना चाहिए और सामान्य काम क्रीड़ा में फ़ोकस करना चाहिए। फ़ोरप्ले के बगेर इन दवाओं का कोई असर नहीं होता। ये कोई रामबाण नहीं हे कि हर बार हर समस्या में फ़ायदा करे। इन्हें डॉक्टर की सलाह पर ई॰डी॰ के उपचार के लिए ही उपयोग करना चाहिए। कई बार कम से कम पाँच बार लगातार लेने पर ही इनका फ़ायदा महसूस होता हे । इसलिए एक प्रयोग पर यदि फ़ायदा न हो तो निराश होने की ज़रूरत नहीं। यदि पाँच बार लेने पर भी असर न हो तो भी कई आप्शन होते हे। मुख्य साइड इफ़ेक्ट सिर दर्द , असिडिटी , क़मर दर्द, घबराहट और बेचैनी हो सकती हे पर कोई सीरीयस साइड इफ़ेक्ट नहीं होता।
यदि हार्ट प्रॉब्लम के लिए नाइट्रेट दवा आप को दी जा रही हो तो इन दवाओं को लेना पूरी तरह वर्जित हे।
इन दवाओं के अतिरिक्त हॉर्मोन उपचार ,मानसिक तनाव के उपचार के लिए उपयुक्त दवाओं का प्रयोग किया जाता हे।
2. इंटरापीनायल इंजेक्शन थेरपी- ऊपर बताई गई दवाओं से सौ में से साठ को ही फ़ायदा होता हे। ऐसे लोगों के लिए ये विधि अत्यंत कारगर हे। कुछ दवाओं जैसे प्रॉस्टग्लैंडिन, पपवेरने और क्लोर प्रोमाजिन आदि अकेले या मिक्स करके उपयुक्त डोस में दी जाए तो लिंग पर इनका शानदार असर होता हे। पहले हॉस्पिटल में डॉक्टर ये पहचान करेंगे कि आपको किस दवा की कितनी मात्रा से उपयुक्त रेस्पॉन्स मिल रहा हे। फिर आपको छोटी इंसुलिन सिरिंजज़ में दवा की उतनी मात्रा ही तैयार करके घर ले जाने को कहेंगे। पहले आप को स्वयं से या पार्ट्नर से इंजेक्शन कैसे लेना हे – इस में प्रशिक्षित करेंगे। इस में भी इंजेक्शन लेकर सामान्य काम क्रीड़ा में सम्मिलित होना चाहिए । मुख्य साइड इफ़ेक्ट हे- आवश्यकता से अधिक देर तक लिंग टाइट रहना जिसे प्रीयपिसम कहते हे । इसमें टाइट रहने के अतिरिक्त पीनस में दर्द भी होता हे। इसका तुरन्त उपचार होना चाहिए नहीं तो समस्या और गम्भीर हो सकती हे। इसे एक दिन में एक बार से अधिक नहीं लेना चाहिए।
3. वैक्यूम इरेक्शन डिवाइस- इसमें एक सिलेंडर नुमा यंत्र को पीनस पर रख कर नेगेटिव प्रेशर बनाया जाता हे। इस से पीनस का आकार बड़ा हो जाता हे ।लेकिन ऐसा पूरी तरह नियंत्रित तरीक़े से किया जाता हे।वांछित स्तर पे सिलेंडर पे लगा एक रिंग पीनस पर सरका देते हे जिस से वही स्थिति को अधिकतम 30बाज़ार में कई प्रकार के निम्न गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध हे जिनका प्रयोग ख़तरनाक हो सकता हे। केवल 30 मिनट तक इस रिंग को पहना जासकता हे । इस विधि से सेक्स करना काफ़ी मेहनत भरा हो सकता हे पर ये पूरी तरह सेफ़ हे।
4. पीनायल इंप्लांट सर्जरी- यदि कोई तरीक़ा अपेक्षित परिणाम न दे तो इसे कर सकते हे। इस का प्रयोग सोच समझ कर करना चाहिए क्योंकि ये एक अचल और आक्रामक उपचार हे । सर्जरी होने के बाद आप को इसी पर निर्भर रहना होगा । इसमें पीनस में ऑपरेशन द्वारा दो सिलेंडर नुमा पार्ट फ़िट कर देते हे। सेक्स के लिए इन्हें सीधा कर लेते हे और बाद में इसे फ़ोल्ड कर के अंडर गर्मेंट्स में छुपा लेते हे। ऐसे ही एक अन्य ऑपरेशन में नीचे अंडकोश के पास एक पार्ट फ़िट कर देते हे । इस में सेक्स के लिए इस पार्ट को पम्प की तरह दबाना होता हे जिस से एक अन्य पार्ट का सेलायन वॉटर सिलेंडर में चला जाता हे। इस से पीनस सेक्स के योग्य हो जाता हे । सेक्स के बाद उसी पम्प को दोबारा चलाना होता हे तो सिलेंडर वापिस पहले की स्थिति में आ जाता हे।

इसका अर्थ हे कि योनि में प्रवेश के बाद डिस्चार्ज होने में अधिक समय लगना जिससे एक या दोनो पार्ट्नर को परेशानी हो। अनेक लोग इसके लिए कभी डॉक्टर के पास नहीं आते क्योंकि इसे एक लाभकारी बीमारी मानते हे। परन्तु यदि पुरुष लगातार काफ़ी समय से सेक्स के समय चाह कर भी डिस्चार्ज न हो तो इस से निराशा होने लगती हे । विशेषतोर पर जो गर्भ धारण का प्रयास कर रहे हों, ये बड़ी परेशानी का कारण होती हे

कारण-

दवाओं के साइड इफ़ेक्ट के कारण – जैसे डिप्रेशन की दवा , बीपी की दवा यदि आप ले रहे हों तो ऐसा हो सकता हे।
1. यदि आपका ध्यान सेक्स के समय इधर उधर भटक जाए जिस से आप को ऐंज़ाइयटी हो तो वांछित उत्तेजना के स्तर पर नहीं पहुँच पाएँगे और लिंग समय से पहले टायट्नेस खोने लगेगा I ऐसेमें चरमोत्कर्ष पर पहुँचना बड़ा मुश्किल होगा।
2. नर्वस सिस्टम की बीमारी जैसे मल्टिपल स्क्लरोसिस (MS)
3. अपने पार्ट्नर को यदि नापसंद करते हों
4. एजिंग या उम्र के प्रभाव से भी देरी से स्खलन हो सकता हे

उपचार-

1. यदि दवा का साइड इफ़ेक्ट दोषी हे तो dose कम करने पर या कोई और दवा बदलने पर ठीक हो सकता हे
2. पार्ट्नर को कहें कि फ़ॉरप्ले अधिक करे और लिंग पर सीधा स्टिम्युलेट करे। कुछ नया तरीक़ा अपनाना फ़ायदेमंद हो सकता हे
3. वाइब्रेटर का सही प्रयोग फ़ायदे मंद हो सकता हे

सेक्स के बारे में प्रचलित अनेकों ग़लत धारणाओं में से एक हे – स्वप्न दोष के बारे में।
सामान्य मनोयौन विकास की प्रक्रिया में युवा होने पर शरीर में अनेक परिवर्तन आते है। बाह्य सेक्स के अंग विकसित होते हे और आंतरिक अँगो में शुक्राणु विकसित होते हे और वीर्य बनाने वाली ग्रंथिया सक्रिय हो जाती हे। ये सब सेक्स हॉर्मोन टेस्टास्टरोन की अति सक्रियता से ही संचालित होता हे ।
स्वप्नदोष का मामला भी इसी टेस्टास्टरोन से सम्बंधित हे । सुबह के समय इस हॉर्मोन का स्रवा सबसे अधिक होता हे जिस से नींद के दौरान इरेक्शन होता हे, अवचेतन अवस्था में शरीर में उत्तेजना के सभी लक्षण होने लगते हे और इसी कड़ी में स्वप्न आने के साथ इजैक्युलेशन अथवा डिस्चार्ज हो जाता हे ।
अनेक लोग मानते हे कि वीर्य आपकी शक्ति और ऊर्जा का स्रोत होता हे इसलिए इस प्रकार वीर्य निकलने से कमज़ोरी हो जाती हे।

ये बात सिरे से ही अवेज्ञानिक और तर्कहीन हे।
वीर्य एक सामान्य सा शारीरिक द्रव्य हे जो लगातार बनता हे। डिस्चार्ज होने पर फिर से ग्रंथिया सक्रिय हो जाती हे और वांछित मात्रा बना कर अस्थायी रूप से निष्क्रिय हो जाती हे। यही कर्म जीवन भर चलता हे ।
वीर्य डिस्चार्ज होने से कमज़ोरी नहीं आतीं अपितु ज़्यादा चिंता से परेशानी होती हे ।

आम धारणा के विपरीत दुनिया में अधिकांश पुरुषों के लिंग में थोड़ा टेढ़ापन होता हे ।
पंद्रह डिग्री तक का टेढ़ा पन सामान्य होता हे या यदि सेक्स के लिए आप योनि में प्रवेश करा के सेक्स कर सकते हे तो ये बिलकुल सामान्य हे। यदि ये ना कर पाए तो स्थिति के उपचार की आवश्यकता हे ।

कई बीमारियाँ होती हे जहाँ लिंग का आकार धनुष की तरह हो सकता हे और सेक्स करना असम्भव होता हे ।
1. पेयरोनी डिज़ीज़- इसमें लिंग में मध्य से किसी भी दिशा में bend आ सकता हे और ये तीस से नब्बे डिग्री से अधिक भी हो सकता हे । कई बार सेक्स के अतिरिक्त पेशाब करने में भी परेशानी होती हे क्योंकि कपड़े गीले हो जाते हे । ऐसा अक्सर मधुमेह से या उम्र के प्रभाव से हो सकता हे । अनेक मामलों में टेढ़ापन होने से पहले लिंग में उत्तेजना होने पर दर्द भी हो सकता हे। ऐसे मामलों में तुरंत इलाज करना ज़रूरी हे । कई बार शल्य चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती हे।
2. कोरडी- कई बार लिंग में पेशाब निकलने का स्थान बिलकुल आगे न हो कर लिंग के नीचे या ऊपर की तरफ़ होता हे। नीचे होने के साथ लिंग भी नीचे की और मुड़ा होता हे जिस से पेशाब करने और सेक्स करने में परेशानी होती हे ।

“महिला की सेक्स की संतुष्टि के लिए बड़े साइज़ की आवश्यकता होती हे” पूरे विश्व में ये ग़लत धारणा सबसे ज़्यादा लोगों में पायी जाती हे।
गर्भ धारण या फिर चरमोत्कर्ष के लिए आवश्यक हे कि पुरुष का लिंग सेक्स के दौरान बच्चेदानी पर प्रहार करे- ऐसी बेतुकी धारणाओं की कमी नहीं हे।
हाल में मेरे पास एक स्वस्थ पुरुष बाँझ पन की समस्या के साथ आया । उसका मानना था कि उसके छोटे लिंग साइज़ के कारण उसकी पत्नी गर्भ धारण नहीं कर पा रही इस लिए वो मुझ से ज़िद करने लगा कि में उसके लिंग साइज़ बड़ा करने का कोई उपचार बताऊँ। मैंने समझा कर सुझाव दिया कि पहले अपने वीर्य की जाँच कराए। पता चला कि उसके शुक्राणु अनुपस्थित हे। जब शुक्राणु ही नहीं तो गर्भ कैसे ठहर सकता है। फिर मैंने उसे समझाया की साइज़ का गर्भ धारण या सेक्स संतोष में कोई महत्व नहीं है l

असल में यदि आपके उत्तेजित लिंग का साइज़ दो इंच से ज़्यादा हे तो आप एक संतोषप्रद सेक्स जीवन जी सकते है।
इसका कारण है कि उत्तेजित अवस्था में योनि का आकार लगभग छह इंच होता हे परंतु केवल बाहरी एक तिहाई हिस्सा ही संवेदनशील होता है। इसका अर्थ हे कि बाहरी एक तिहाई में ही सेक्स की अनुभूति हो सकती हे। यानी दो इंच का लिंग यदि सेक्स करता हे तो उतनी ही उत्तेजना पैदा करता है जितना कोई भी अन्य लिंग l
इसलिए ये समझ लेना अति आवश्यक हे कि बड़े साइज़ के लिंग होने से कोई भी अतिरिक्त लाभ नहीं मिलता – केवल आपके अहम् की संतुष्टि हो सकती हे। कृपया मार्केट में उपलब्ध नाना प्रकार के उपकरण , दवाई या तेल के पीछे न भागे , इनका कोई फ़ायदा नहीं है।

अनेक विज्ञापन अख़बार में ये दावा करते हुए मिलजाएँगे कि ”बचपन की ग़लतियों से पतले वीर्य को गाड़ा करने की गारंटीशुदा दवा”
आपने ज़रूर ऐसे ही किसी विज्ञापन को ज़रूर देखा होगा और हो सकता हे किआपमें से कुछ ने इसे प्रयोग भी किया हो। तो कैसा था आपका अनुभव। क्या गाड़ा हुआ वीर्य ???
नहीं, बिलकुल नहीं हुआ होगा क्योंकि ऐसा होना सम्भव ही नहीं है। वीर्य के गाड़ेपन या पतलेपन से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा ।

सामान्यत डिस्चार्ज के समय वीर्य जेली की तरह ग्रे या वाइट कलर का होता हे और लगभग तीस मिनट के बाद पानी जैसा होना शुरू होता हे ताकि योनि में स्थित शुक्राणु तैर कर गर्भाशय में जा सके ।
इसलिए वीर्य का गाड़ा होना भी एक मुसीबत का कारण बन सकता है जब ये कोई इन्फ़ेक्शन की निशानी होता है या गाड़ेपन के कारण गर्भ धारण में कठिनाई आ जाती है।
सारा दारोमदार वीर्य में उपस्थित नोर्मल शुक्राणुओं पर होता हे , गाड़ापन प्रॉब्लम ही दे सकता है, फ़ायदा नहीं।

शादीशुदा लोगों में से लगभग पंद्रह प्रतिशत को गर्भ धारण में दिक़्क़त होती है। शादी के बाद एक वर्ष तक यदि नियमित सेक्स के बावजूद गर्भ धारण ना हो तो कोई न कोई समस्या हो सकती है।
सबसे पहले पुरुष के वीर्य की जाँच करनी चाहिए। आप हॉस्पिटल में जाकर हस्तमैथुन से वीर्य का सैम्पल दे सकते है। इसके लिए एक दिन के गप की ही ज़रूरत होती है।
सामान्यत बीस मिलीयन शुक्राणु से अधिक संख्या और पचास प्रतिशत से अधिक छपलता या मूव्मेंट हो तो सामान्य समझा जाता है। लगभग आधे मामलों में गर्भ धारण न कर पाने का कारण शुक्राणु समस्या होती है।
इसमें या तो संख्या कम हो सकती हे ,( Oligospermia) छपलता कम हो सकती हे ( Asthenospermia) या फिर वीर्य से शुक्राणु पूरी तरह से नदारद हो सकते हे ( Azoospermia).

इसके कई कारण हो सकते है- (Azoospermia)
1.आपकी टेस्टिस में शुक्राणु बनते ही नहीं तो निल शुक्राणु ही होंगे । ऐसे मरीज़ों में छोटे से ऑपरेशन से टेस्टिस के टुकड़े की लैब में जाँच होती हे जिस से इस समस्या का तुरंत पता लग जाता है।
2. आपकी टेस्टिस में शुक्राणु बनते भी हे, मैचयौर भी होते हे परंतु वास नली अवरुद्ध होने से बाहर नहीं जा पाते । ऐसे में ऑपरेशन से ये रुकावट खुल सकती है।

शुक्राणु की कमी ( Oligospermia) एवम् चपलता की कमी- इसके भी अनेक कारण हो सकते हे-
1. वैरिकोसील (Varicocele)- टेस्टिस से हृदय की तरफ़ के रक्त संचार की व्यवस्था छोटी छोटी वेन के माध्यम से होती हे । किन्हीं कारणो से ये व्यवस्था दोषपूर्ण हो जाती है और रक्त संचार अपूर्ण धीमा हो जाता है। नतीजा होता हे कि इन शिराओं का साइज़ बड़ जाता है और टेस्टिस के आसपास एक से दो डिग्री तक तापमान बड़ जाता है। शुक्राणु बनने में ये सबसे बड़ी बाधा होती है। वास्तव में शुक्राणु समस्या के मामलों में से सत्तर प्रतिशत बार यही बात समस्या की जड़ होती है। और इसे माइक्रस्कापिक सर्जरी से ठीक कर सकते है
2. वीर्य में संक्रमण- कई बार पार्ट्नर से या अपने आप वीर्य में संक्रमण हो जाता जिससे गर्भ धारण मुश्किल होता है। दोनो पार्ट्नर्ज़ का उपचार एक साथ करना चाहिए।
3. वीर्य में उपस्थित ऐंटीबाडीज़- कई बार वीर्य में ऐसे मॉलक्यूल होते हे जो अपने शरीर में पैदा होने पर भी अपने शरीर को नुक़सान देते है। सामान्य तौर पर ऐसे मालक्यूल बाहरी तत्त्वों जैसे रोगाणुओं से बचाव का काम करते हे परंतु इन ख़ास परिस्थितियों में अपने शरीर के तत्त्वों को ही हानि पहुँचाते है। इसके लिए IUI का सहारा लिया जाता है।

सेक्स के बारे में अनेकों ग़लत धारणाओं में से एक यह भी है। आमतौर पर मरीज़ को शिकायत होती हे कि पेशाब के साथ वीर्य निकल जाता है जिस से उन्हें कमज़ोरी, जल्दी थक जाना, वीर्य की कमी और पतला वीर्य, शीघ्रपतन और नाड़ियों की कमज़ोरी।

ऐसी धारणा एक ग़लत फ़हमी से पैदा होती है कि वीर्य मानव की ऊर्जा और शक्ति का स्रोत हे इसलिए यदि ये व्यर्थ बहा तो सर्व नाश होगा। कुछ संस्कृतियों में पूर्ण ब्रह्मचर्य को शक्ति संचय का साधन माना जाता है। परंतु इसमें कोई वेज्ञानिक तथ्य नहीं है।
पहले तो ये बात ग़लत हे कि पेशाब के साथ चिकना सा पानी जैसा ट्रैन्स्पेरेंट द्रव्य वीर्य होता हे। ये पेशाब और वीर्य निकास के कॉमन रास्ते युरीथ्रा नली के चारों और की ग्रंथियों का सामान्य सा द्रव्य है।
इसका बनना या न बनना आपके नियंत्रण में न होकर सेक्स हॉर्मोन टेस्टास्टरोन से संचालित होता है।
आपके दिमाग़ में सेक्स सम्बंधित विचार आने या कोई भी अन्य सेक्शूअल संकेत से स्वचालित इस द्रव्य का एक अति महत्वपूर्ण कार्य होता है- सेक्स के समय अपेक्षित चिकनाई प्रदान करना ताकि सम्भोग सहजता से सम्पन्न हो सके और युरीथ्रा नली के अंदर का वातावरण अम्लीय से क्षरिय किया जा सके। इससे शुक्राणु सुरक्षित बाहर जा सकते हे। अन्य तकलीफ़े जैसे कमज़ोरी वगेरह तो चिंता की वजह से होती हे। इसलिए ये बात पूरी तरह से बेबुनियाद हे कि पेशाब के साथ कोई धातु या वीर्य निकलने से कमज़ोरी आ जाती है।

ये हाल के वर्षों में ही सामने आयी सेक्स समस्या है। शादी के बाद सेक्स – जिसे एक बेहद सामान्य बात समझा जाता है, उसी में इतनी तेज़ी से बढ़ती हुई मुश्किलें एक चिंताजनक हक़ीक़त की और इशारा करती है। समाज में कुछ तो हे जो तेज़ी से बदल रहा है!
मेरे पास अनेकों अनेक युवा केवल ये चेक करने के लिए आते हे कि शादी के बाद अपनी पत्नी को वो संतुष्ट कर पाएँगे या नहीं। युवा लड़कों में असुरक्षा की भावना आ रही है कि यदि सेक्स में संतुष्ट नहीं किया तो बदनामी तो होगी ही, दोबारा विवाह भी आसान न होगा।
कन्या भ्रूण हत्या की कुछ क़ीमत तो चुकानी ही होगी आख़िर समाज को लड़कों का विवाह अब आसान नहीं रह गया है इसलिए टेन्शन होना समझा जा सकता है। फिर इंटर्नेट की आसान उपलब्धि से पोर्न विडीओज़ आसानी से उपलब्ध है जिनसे अव्यवहारिक उम्मीद हो जाती हे जिसे असल ज़िंदगी में पूरा नहीं किया जा सकता। मेरे पास अनेक युवा पोर्न फ़िल्म जैसी सेक्स लाइफ़ को प्राप्त करने के लिए आते हे जो सम्भव नहीं हे । आज निश्चित ही लड़कियों में शिक्षा का स्तर बढता जा रहा हे इसलिए लड़का लड़की दोनोही शादी के समय पढ़ाई कर रहे होते हे या नौकरी । सप्ताह में एक या दो दिन साथ रह पाते हे जिसका वो पूरा फ़ायदा उठाना चाहते हे । ऐसे में भी समस्या होना सम्भव हे ।
कुछ समय बाद घर वाले गुड न्यूज़ के लिए पूछने लगते है। जब नियमित सेक्स ही नहीं होगा तो सब कुछ सामान्य होने पर भी गर्भ कैसे ठहरेगा? इसी समय किसी बांझपन उपचार केन्द्र में इलाज लेने की शुरुआत होती है और सेक्स प्रॉब्लम की बात सामने आती हे । सेक्स के लिए समय कहाँ हे ???? इसका अर्थ हे कि शादी का उद्देश्य ही एक दो बच्चे पैदा करके सबका मुँह बंद करना हे कि सब ठीक चल रहा हे ।
सफल दाम्पत्य जीवन के लिए दोनो पहियों का साथ चलना ज़रूरी है और संतोष पूर्ण सेक्स के लिए भी दोनो का सामान्य होना ज़रूरी हे इसलिए किसी एक को ही सेक्स न होने के लिए दोषी मान लेना उचित नहीं है।

लड़कों में समस्या हो सकती हे – शीघ्रपतन , ई॰डी॰ या मर्दाना कमज़ोरी, कामेच्छा की कमी या समलेंगिकता हो सकती हे जिस से शादी के बाद सेक्स न हो सके जबकि लड़की पसंद न हो , कहीं दूसरी जगह आकर्षण हो तो भी प्रॉब्लम हो सकती है।
लड़की में समस्या हो सकती हे- असामान्य और अनावश्यक उम्मीद , सेक्स के समय दर्द होना ( वगिनिस्मस)

वैजी्निसमस- इसका अर्थ हे कि वजाइना का प्रवेश बिलकुल टाइट बंद हो जाता हे जिस से सेक्स करना असम्भव हो जाता है। पुरुष को कोई प्रॉब्लम न होने पर भी अनभिज्ञता के कारण अधिक ज़ोर लगाने पर ज़्यादा टाइट बंद हो जाता हे और ऐसा महसूस होने लगता जे कि मानो आप कोई दीवार को हिट कर रहे हों। बार बार असफल होने पर पुरुष को भी टेन्शन हो जाती हे जिस से उसे ई॰डी॰ हो जाता हे । घूमफिर कर पूरा ज़िम्मा पुरुष पर आ जाता हे कि उसे सेक्स समस्या हे। मेरे कुछ मरीज़ों के अनुसार तो उन्हें नपुंसक कह कर तलाक़ हो गया । ये सब इसलिए भी हुआ कि कई मामलों में तो लड़की ने स्वयं के चेकअप को ये कह कर मना कर दिया कि उन्हें पता हे कि वो ठीक हे । कई बार तो केवल लिंग के प्रवेश के समय ही वैजिनल ओपनिंग बंद होती हे , डॉक्टर के चेक करते समय या फ़िंगर डालते हुए कोई परेशानी नहीं होती ।
इसके कई कारण हो सकते हे जैसे सेक्स में दर्द होने का डर, इन्फ़ेक्शन, टाइट हायमन , पहले हुआ यौन शोषण , रेप आदि
कई बार दोनो को ही सेक्स के बारे में सही ज्ञान नहीं होता तो सेक्स के लिए सही पज़िशन बनाना मुश्किल होता है।

क्या नहीं करना चाहिए-
1. मेरे पास आने वाले हर ऐसे मरीज़ को सबसे पहले एक दूसरे की आलोचना बंद करने को कहता हूँ। ये प्यार मुहब्बत का मामला हे और इसमें आलोचना का कोई काम नहीं।
2. इस रिश्ते को पूरी कमिट्मेंट से लेना चाहिए। अलग होना या तलाक़ जैसे ख़याल अगर दिमाग़ में हे तो मेरे पास आने से कोई फ़ायदा नहीं होगा।
3. यथासम्भव इसे बेडरूम की चारदीवारी से बाहर न जाने दे । एक बार बात बाहर गयी तो तरह तरह के सामाजिक दबाब सेक्स लाइफ़ को बर्बाद कर देंगे ।
शादी के बाद सेक्स संबंधो को पूरी इम्पॉर्टन्स दे, थोड़ा बहुत स्थगित करना तो ठीक हे परंतु यदि एक हफ़्ते से ज़्यादा समय तक आपका जीवन साथी सेक्स सम्बंध बनाने में आनाकानी करे तो डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए। दोनो यदि सहयोग करे तो ऐसे सभी केस ठीक हो सकते है।

कई बार सेक्स करते हुए या हस्तमैथुन करते हुए लिंग में चोट लग जाती है। कई बार बाह्य रक्त स्रवा होता हे जैसा कि लिंग की आगे की टाइट त्वचा के छिलने या फटने पर और कई बार आंतरिक रक्त स्रवा होता हे जैसे के लिंग के फ़्रैक्चर होने पर।
बाहरी ख़ून बहना – कई मामलों में योनि में प्रवेश के समय या सेक्स के बीच में भी लिंग के बाहर की चमड़ी फट ज़ाती हे या कट लग जाता है। ऐसा यदि योनि में सूखा पन हो, इन्फ़ेक्शन हो या लिंग के सामने की त्वचा सहजता से आगे पीछे न हो तो हो सकता है। ऐसा होने पर घबराए नहीं, केवल ख़ून बहने की जगह को पंद्रह मिनट टाइट दबा कर रखे और अगले दिन डॉक्टर को दिखाए।

अंदरूनी ख़ून बहना – इसे लिंग का फ़्रैक्चर भी कहते है। लिंग जब पूरे तनाव में होता हे तो हड्डी की तरह कड़क हो जाता हे । आम तौर पर ऐसा तब होता हे जब पूरी तरह सख़्त हुए लिंग पर सेक्स के समय महिला बैठ जाती है( Female Superior position ) परन्तु अन्य पज़िशन में भी फ़्रैक्चर हो सकता है। मुख्य लक्षण हे – दर्द होना , क्लिक की आवाज़ आना और तुरंत ही सूजन आ जाना । आसपास की जगह काली हो जाती है। इसमें लिंग के अंदरूनी सिलेंडर ( Corpora Cavernosa ) के बाहर की सख़्त झिल्ली ( Tunica Albuginea) क्रैक हो जाती है। ये एक मेडिकल इमर्जेन्सी हे और इसका तुरंत सर्जिकल उपचार करवाना चाहिए। पहले चौबीस घंटे में सर्जरी करने से बाद की कॉम्प्लिकेशंज़ की सम्भावना कम हो जाती है। कभी कभी पेशाब का रास्ता युरीथ्रा भी चोटिल हो जाता हे जिस से लिंग से ख़ून बहना शुरू हो सकता है। ये ज़्यादा चिंता जनक स्थिति है। कॉम्प्लिकेशंज़ हो सकती है- नपुंसकता, लिंग का टेढ़ा होना या सेक्स के समय दर्द होना l

एचआईवी- इसका अर्थ है ह्यूमन इम्युनोडेफ़िशन्सी वाइरस। यौन संबंधो द्वारा एक से दूसरे को होने वाला रोग। यौन संक्रमण का अर्थ केवल HIV या AIDS तक सीमित नहीं है,अपितु कई अन्य संक्रमण रोग भी यौन संबंधो से फैल सकते है , जैसे हर्पीज़, वॉर्ट या पपिल्लोमा वाइरस, सिफ़िलस या सुजाक ,और भी अन्य कई।इस संक्रमण से शरीर के T cells नष्ट होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है , परिणाम स्वरूप शरीर में अनेक प्रकार के रोग हो जाते है जिन्हें AIDS कहते है । इसमें एक या एक से अधिक सामान्यत होने वाले संक्रमण असामान्य रूप से उग्र हो जाते है या कैन्सर भी हो सकता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने से इनका उपचार कठिन होता है।

एचआईवी के बारे में कुछ तथ्य-
1. भारत में हर वर्ष लगभग एक लाख नए लोगों का HIV से संक्रमित होने का पता चलता है।
2. भारत में लगभग 22 लाख लोग एड्ज़ से पीड़ित है।
3. एचआईवी पॉज़िटिव होना ही एड्ज़ की निशानी नहीं है, एचआईवी पॉज़िटिव होने के बाद एड्ज़ होने में काफ़ी समय लग सकता है (10-12 वर्ष तक ) जो आपके स्वास्थ्य, जीवन शैली और उम्र पर निर्भर करता है।
4. एचआईवी संक्रमित व्यक्ति से सेक्स करने से कोई ज़रूरी नहीं कि आपको भी एचआईवी हो जाएगा। योनि मैथुन द्वारा 100 में से एक को संक्रमण होगा । गुदा मैथुन से संक्रमण की सम्भावना ज़्यादा होती है और मुख मैथुन से योनि मैथुन के मुक़ाबले कम होतीहै। इसके अतिरिक्त संक्रमण होना या न होना इस पर भी निर्भर करता है कि उसका वाइरल लोड कितना है और क्या वो ऐंटाईवाइरल दवा ले रहा है ? आपकी अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी है?

एचआईवी संक्रमण कैसे होता है-
यदि एचआईवी वाइरस शरीर की आन्तरिक झिल्ली जैसे मुख , योनि , गुदा के सम्पर्क में आ जाए या शारीरिक द्रव्यों का आदान प्रदान हो जाए जैसे योनि के स्राव तथा वीर्य , मुँह की लार में यदि वाइरस युक्त रक्त मिला हो तो गहरे चुम्बन से भी थोड़ा ख़तरा होता है।
इन से एचआईवी नहीं फैलता-
हाथ मिलाने से ;बर्तन ,खाना ,टॉयलेट सीट या बिस्तर शेयर करने से ; सोशल किस या सहलाने से ; खाँसी से

एचआईवी वाइरस शरीर में क्या करता है-
एचआईवी वाइरस शरीर की T4 नामक सेल या कोशिकाओं को नष्ट करता है जिसके परिणामस्वरूप रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है और कई तरह के इन्फ़ेक्शन और कैन्सर उत्पन्न हो जाते है।

एचआईवी टेस्ट-
इसके बारे में अनेक भ्रामक धारणायें प्रचलित हे। असल में वाइरस का पता शरीर में प्रवेश के कई दिन बाद लगता है। वाइरस के शरीर में प्रवेश से लेकर टेस्ट पॉज़िटिव आने के अंतराल को विंडो पिरीयड कहते हे। ये अलग अलग टेस्टो के लिए अलग अलग होता है।
सबसे जल्दी पता 7-12 दिन में लग सकता है। इस टेस्ट का नाम है – Viral load PCR टेस्ट ; RNA एंड DNA PCR टेस्ट क़रीब 2-3 हफ़्ते के बाद पॉज़िटिव आ सकता है और अन्य ऐंटीबोडी टेस्ट के लिए 3 हफ़्ते विंडो पिरीयड होता है। 6 हफ़्ते में सामान्य तौर पर सभी केसेज़ का पता लगाया जा सकता है और यदि सम्भव संक्रमण के तीन महीने के बाद भी टेस्ट नेगेटिव है तो एचआईवी की कोई सम्भावना नहीं होती।
एचआईवी टेस्ट रिज़ल्ट पर पूरी गोपनीयता बरती जाती है और केवल मरीज़ को ही बताई जाती है।
कई तरह के मनोवेज्ञानिक बातें एचआईवी से जुड़ी है। मरीज़ को अवसाद हो सकताहै और व्यग्रता तो होती ही है। निराशा और पछतावे की भावना मुख्य होती है। ऐसे लोग काफ़ी समय तक सेक्स से बचते है क्योंकि उन्हें संक्रमण फैलने का डर होता है।

एचआईवी का उपचार-
कई तरह की दवाईया उपलब्ध है जिनसे आप अनेक वर्षों तक सामान्य जीवनजी सकते है।

सामान्य अवस्था में लिंग के आगे की चमड़ी आसानी से आगे पीछे हो सकती है। परंतु ऐसा करना दुष्कर हो सकता है जब आगे की चमड़ी अत्यंत संकीर्ण हो। इस अवस्था को फिमोसिस कहते है। इस में चमड़ी को लिंग के अग्र भाग से पीछे नहीं किया जा सकता।
जीवन के आरम्भिक वर्षों में लिंग के अग्र भाग से चमड़ी चिपकी रहती है और 2-6 वर्ष की आयु तक धीरे धीरे अलग हो जाती है इसलिए अभिभावको को अनावश्यक रूप से घबरा कर छोटे बच्चे के लिंग की त्वचा से ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए। ज़बरदस्ती पीछे करने की कोशिश से चमड़ी कट सकती है और स्थिति और ख़राब हो सकती है। यदि बच्चा बार बार अपने लिंग को खुजलाए, पेशाब करने में रोए या लिंग के अगले हिस्से में लाली दिखने लगे तो युरॉलजस्ट /सेक्सोलोजिस्ट या पीडीऐट्रिक सर्जन को दिखाना चाहिए। ऐसे में डॉक्टर आपको ऐंटीबायआटिक एवं अथवा स्टेरॉड क्रीम दे सकते है जिस से चमड़ी मुलायम हो कर पीछे ले जायी जा सकेगी। यदि छः वर्ष की आयु तक चमड़ी अलग न हो या ऊपर लिखी परिस्थितियों में से कोई हो तो इसे सर्जरी द्वारा भी ठीक किया जा सकता है।

जब चमड़ी पीछे होने लग जाए तो सभी पुरुषों को अपना लिंग नित्यप्रति स्नान के समय चमड़ी पीछे करके गुनगुने पानी से धोना चाहिए । कोई भी तेज़ केमिकल डिटर्जेंट या साबुन को लिंग के अग्र भाग की सफ़ाई के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए । अग्र भाग में एक स्राव उत्पन्न होता है जिसे समेगमा कहते है। इसे नियमित रूप से साफ़ करना चाहिए। वैसे बाल्यावस्था में छः वर्ष की आयु तक इसकी मात्रा नाममात्र ही होती है परंतु युवावस्था से चालीस वर्ष तक ये काफ़ी मात्रा में होता है। इसका कार्य सेक्स के समय चिकनाहट पैदा करना होता है। यदि इसे साफ़ न किया जाए तो लिंग में खुजली या जलन हो सकती है और विरले कभी कभी कैन्सर भी हो सकता है। इसलिए लिंग की समुचित साफ़ सफ़ाई अत्यंत आवश्यक है।

यदि फिमोसिस पर ध्यान ना दिया जाए तो समस्या पैदा हो सकती है जिससे glance यानी लिंग के अग्रभाग पर सोजन आ जाती है अथवा smegma जम जाता है बच्चों में इससे पेशाब का इन्फेक्शन हो सकता है|
वयस्कों में इसके कारण संभोग करने में समस्या हो सकती है ।यदि फिमोसिस वाला व्यक्ति संभोग करने की कोशिश करें तो चमड़ी फट सकती है और रक्त स्राव हो सकता है ।मैंने ऐसे अनेक केसेज़ देखे हैं जिस में दर्द के कारण अनेक लोग शादी के बाद सेक्स संबंध नहीं बना पाते और नॉन कंज्यूमेशन ऑफ मैरिज हो जाती है ।शर्म के कारण इस समस्या को कभी परिवार में या किसी अन्य के साथ डिस्कस नहीं किया जाता जिससे यह पूरी तरह से नेगलेक्ट हो जाती है और स्थिति कभी कभी शादीशुदा संबंध टूटने के कगार तक पहुंच जाती हैं। कुछ समय के बाद दर्द के डर के कारण लड़का लड़की शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करना ही छोड़ देते हैं।
यह अवस्था जन्म से भी हो सकती है अथवा बाद में भी ।इंफेक्शन, एग्जिमा, लाइकेन प्लेनस और लाइकेन स्क्लेरोसस जैसी चमड़ी की बीमारियों के कारण भी हो सकती है ।चमड़ी आगे से काफी संकरी हो जाती है और स्थिति काफी गंभीर हो जाती है।
मैंने ऐसे अनेकों अनेक मरीज देखे हैं जिनमें उन्हें अपनी शुगर की बीमारी का पता लिंग के इंफेक्शन की जांच के दौरान संयोग से लगती है ।यह ज्ञात रहे कि लिंग पर बार बार इन्फेक्शन होना शुगर की बीमारी का लक्षण हो सकता है ।इसलिए हम हर मरीज में शुगर की जांच अवश्य करते हैं।
कई बार लिंग की चमड़ी को पीछे ले जाने के बाद वापस आगे लाना मुश्किल होता है और वह ग्लांस के बेस पर एक रिंग बना देती है। इसको पैराफिमोसिस कहते हैं। मैंने ऐसे अनेक मरीज देखे हैं जहां पर पैराफिमोसिस होने के बाद उन मरीजों ने स्थिति की पूरी उपेक्षा की। फलस्वरूप उनके लिंग के अगले हिस्से में काफी ज्यादा सूजन आ गई थी और दर्द भी काफी हो रहा था। यह स्थिति काफी गंभीर हो सकती है। सूजन बढ़ते जाने से रक्त का दौरा कम होने लगता है और कुछ दिनों के बाद एक अत्यंत गंभीर स्थिति ,जिसे गैंग्रीन कहते हैं, आ सकती है ।ऐसे में लिंग का ऑपरेशन करके कुछ हिस्से को निकालना ही पड़ता है। यदि समय पर डॉक्टर के पास चले जाएं तो लोकल एनएसथीसिया दे कर समस्या को ठीक किया जा सकता है अथवा एक छोटे ऑपरेशन द्वारा सूजन को कम कर के पूर्व स्थिति बहाल की जा सकती है। ऐसे समय में सरकमसीजन यानी खतना करना अत्यंत आवश्यक होता है
फाइमोसिस का उपचार सर्जरी द्वारा किया जाता है इस सर्जरी को सरकमसीजन कहते हैं ।मरीज को सुबह आकर शाम को छुट्टी दी जा सकती है। इसमें लोकल एनएसथीसिया का इस्तेमाल होता है। सर्जरी के बाद कभी कभी इंफेक्शन या थोड़ा रक्त स्राव हो सकता है परंतु हमने अपने अस्पताल में ऐसा कभी नहीं देखा। 15 से 20 दिनों के अंदर इसके टांके सूख जाते हैं और 3 से 4 हफ्ते के बाद सामान्य शारीरिक संबंध बनाए जा सकते हैं। मरीज को केवल 1 दिन हॉस्पिटल में रहने की आवश्यकता होती है।

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